"आंधी"
खोये खोये सूरज चाँद हैं ,खो चुके हैं सितारे,आसमान में छाई है गर्द, जमीन में छिप चुके हैं साये
रोशिनी सी है मगर खो चुके हैं नज़ारे, रास्तो की उधेड़बुन में खो चुके हैं रही , हर जगह एक भरम सा है, हर जगह शोर सा है,
चीख रहे हैं सब मजबूर होके , पर ख़तम हैं सम्न्वाद सारे, पास कोई दीखता नहीं हैं, अकेली सी अब ये दुनिया भारी है,
हवाए कुछ जोर हैं , हवाए कुछ शोर हैं , बहुत दिनों से मौसम कुछ और है,
बेवक्त ये बदलाव है , बेवजह ये उन्माद है, टूट टूट कर गिर रहे हैं वो इरादे , मजबूत जिनके आधार हैं,
दिखाई दे नहीं रहे हैं , पर बर्बादी के ये आसार हैं , न जाने कब थमेगा , उम्मीद पे भी सब लचर हैं,
बरस पड़े आज ये आसमान , और भरम का नाश हो, व्यथित और प्रथक हैं जिससे सर्वजन , ख़तम ये गुबार हो,
आंसू की तरह ही बह जाये , पर धरती से ये ग़म साफ़ हो,
फिर से कोई नज़र आये और शुरू ये सम्न्वाद हो, हंसी ख़ुशी का शोर हो, और फिर से नए आधारों का निर्माण हो..
-प्रशांत माथुर
Friday, August 27, 2010
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